श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.40

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नदति क्‍वचिदुत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्‍वचित्।

क्‍वचित्तद्भावनायुक्तस्तन्मयोऽनुचकार ह॥ ४०

nadati kvacidutkaṇṭho vilajjo nṛtyati kvacit|

kvacittadbhāvanāyuktastanmayo'nucakāra ha|| 40

अर्थ

वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते। कभी-कभी लोक-लज्जाका त्याग करके प्रेममें छककर नाचने भी लगते थे। कभी-कभी उनकी लीलाके चिन्तनमें इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हींका अनुकरण करने लगते॥ ४०॥

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