कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्का कोमल संस्पर्श अनुभव करके आनन्दमें मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और आनन्दके आँसुओंसे भरे रहते॥ ४१॥
क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्वृतः।
अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षणः॥ ४१
कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्का कोमल संस्पर्श अनुभव करके आनन्दमें मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और आनन्दके आँसुओंसे भरे रहते॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 827) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/41/