श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

प्रह्राद उवाच

स्वः परश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः।

विमोहितधियां दृष्टस्तस्मै भगवते नमः॥ ११

svaḥ paraścetyasadgrāhaḥ puṃsāṃ yanmāyayā kṛtaḥ|

vimohitadhiyāṃ dṛṣṭastasmai bhagavate namaḥ|| 11

अर्थ

प्रह्लादजीने कहा—जिन मनुष्योंकी बुद्धि मोहसे ग्रस्त हो रही है, उन्हींको भगवान्‌की मायासे यह झूठा दुराग्रह होता देखा गया है कि यह ‘अपना’ है और यह ‘पराया’। उन मायापति भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ॥ ११॥✎ 585 586

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #585 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #586 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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