गुरुजी! जैसे चुम्बकके पास लोहा स्वयं खिंच आता है, वैसे ही चक्रपाणिभगवान्की स्वच्छन्द इच्छाशक्तिसे मेरा चित्त भी संसारसे अलग होकर उनकी ओर बरबस खिंच जाता है॥ १४॥✎ 587
यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन् स्वयमाकर्षसन्निधौ।
तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया॥ १४
गुरुजी! जैसे चुम्बकके पास लोहा स्वयं खिंच आता है, वैसे ही चक्रपाणिभगवान्की स्वच्छन्द इच्छाशक्तिसे मेरा चित्त भी संसारसे अलग होकर उनकी ओर बरबस खिंच जाता है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 830) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#587 शब्दोंके बीचका स्थान: चक्रपाणिभगवान् की → चक्रपाणिभगवान्की