श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.14

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन् स्वयमाकर्षसन्‍निधौ।

तथा मे भिद्यते चेतश्‍चक्रपाणेर्यदृच्छया॥ १४

yathā bhrāmyatyayo brahman svayamākarṣasannidhau|

tathā me bhidyate cetaścakrapāṇeryadṛcchayā|| 14

अर्थ

गुरुजी! जैसे चुम्बकके पास लोहा स्वयं खिंच आता है, वैसे ही चक्रपाणिभगवान्‌की स्वच्छन्द इच्छाशक्तिसे मेरा चित्त भी संसारसे अलग होकर उनकी ओर बरबस खिंच जाता है॥ १४॥✎ 587

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #587 शब्दोंके बीचका स्थान: चक्रपाणिभगवान् की → चक्रपाणिभगवान्‌की

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