॥ श्रीहरिः ॥
इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपू रुषा।
अन्धीकृतात्मा स्वोत्सङ्गान्निरस्यत महीतले॥ ३३
ityuktvoparataṃ putraṃ hiraṇyakaśipū ruṣā|
andhīkṛtātmā svotsaṅgānnirasyata mahītale|| 33
अर्थ
प्रह्लादजी इतना कहकर चुप हो गये। हिरण्यकशिपुने क्रोधके मारे अन्धा होकर उन्हें अपनी गोदसे उठाकर भूमिपर पटक दिया॥ ३३॥
इत्युक्त्वोपरतं पुत्रं हिरण्यकशिपू रुषा।
अन्धीकृतात्मा स्वोत्सङ्गान्निरस्यत महीतले॥ ३३
प्रह्लादजी इतना कहकर चुप हो गये। हिरण्यकशिपुने क्रोधके मारे अन्धा होकर उन्हें अपनी गोदसे उठाकर भूमिपर पटक दिया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 832) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/5/33/