श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.34

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

आहामर्षरुषाविष्टः कषायीभू२तलोचनः।

वध्यतामाश्‍वयं वध्यो निःसारयत नैर्ऋताः॥ ३४✎ 1099 1100

āhāmarṣaruṣāviṣṭaḥ kaṣāyībhūtalocanaḥ|

vadhyatāmāśvayaṃ vadhyo niḥsārayata nair:ṛtāḥ|| 34

अर्थ

प्रह्लादकी बातको वह सह न सका। रोषके मारे उसके नेत्र लाल हो गये। वह कहने लगा—‘दैत्यो! इसे यहाँसे बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो। यह मार ही डालने योग्य है॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कषायीकृत०।

    (मुद्रित पृष्ठ 832)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1099 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ता:॥ → नैऋर्ऋताः॥
  • #1100 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋता:॥ → नैर्ऋताः॥

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