श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.36

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

विष्णोर्वा साध्वसौ किं नु करिष्यत्यसमञ्जसः।

सौहृदं दुस्त्यजं पित्रोरहाद्यः पञ्चहायनः॥ ३६

viṣṇorvā sādhvasau kiṃ nu kariṣyatyasamañjasaḥ|

sauhṛdaṃ dustyajaṃ pitrorahādyaḥ pañcahāyanaḥ|| 36

अर्थ

अब यह विश्वासके योग्य नहीं है। पाँच बरसकी अवस्थामें ही जिसने अपने माता-पिताके दुस्त्यज वात्सल्यस्नेहको भुला दिया—वह कृतघ्न भला विष्णुका ही क्या हित करेगा॥ ३६॥

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