युधिष्ठिर! जब शूलोंकी मारसे प्रह्लादके शरीरपर कोई असर नहीं हुआ, तब हिरण्यकशिपुको बड़ी शंका हुई। अब वह प्रह्लादको मार डालनेके लिये बड़े हठसे भाँति-भाँतिके उपाय करने लगा॥ ४२॥
प्रयासेऽपहते तस्मिन् दैत्येन्द्रः परिशङ्कितः।
चकार तद्वधोपायान्निर्बन्धेन युधिष्ठिर॥ ४२
युधिष्ठिर! जब शूलोंकी मारसे प्रह्लादके शरीरपर कोई असर नहीं हुआ, तब हिरण्यकशिपुको बड़ी शंका हुई। अब वह प्रह्लादको मार डालनेके लिये बड़े हठसे भाँति-भाँतिके उपाय करने लगा॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 833) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/42/