श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.43

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

दिग्गजैर्दन्दशूकैश्‍च१ अभिचारावपातनैः।✎ 961

मायाभिः संनिरोधैश्‍च गरदानैरभोजनैः॥ ४३

diggajairdandaśūkaiśca abhicārāvapātanaiḥ|

māyābhiḥ saṃnirodhaiśca garadānairabhojanaiḥ|| 43

अर्थ

उसने उन्हें बड़े-बड़े मतवाले हाथियोंसे कुचलवाया, विषधर साँपोंसे डँसवाया, पुरोहितोंसे कृत्या राक्षसी उत्पन्‍न करायी, पहाड़की चोटीसे नीचे डलवा दिया, शम्बरासुरसे अनेकों प्रकारकी मायाका प्रयोग करवाया, अँधेरी कोठरियोंमें बंद करा दिया, विष पिलाया और खाना बंद कर दिया॥ ४३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—शूकेन्द्रैरभिचाराभिपात०।

    (मुद्रित पृष्ठ 833)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #961 शब्दोंके बीचका स्थान: दिग्गजैर्दन्दशूकैश्‍चअभिचारावपातनै:। → दिग्गजैर्दन्दशूकैश्‍च अभिचारावपातनैः।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें