श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम्।

न विस्मरति मेऽनार्यं शुनःशेप इव प्रभुः॥ ४६

vartamāno'vidūre vai bālo'pyajaḍadhīrayam|

na vismarati me'nāryaṃ śunaḥśepa iva prabhuḥ|| 46

अर्थ

यह बालक होनेपर भी समझदार है और मेरे पास ही निःशंक भावसे रहता है। हो-न-हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुनःशेप* अपने पिताकी करतूतोंसे उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारोंको न भूलेगा॥ ४६॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    शुनःशेप अजीगर्तका मँझला पुत्र था। उसे पिताने वरुणके यज्ञमें बलि देनेके लिये हरिश्‍चन्द्रके पुत्र रोहिताश्‍वके हाथ बेच दिया था तब उसके मामा विश्वामित्रजीने उसकी रक्षा की; और वह अपने पितासे विरुद्ध होकर उनके विपक्षी विश्वामित्रजीके ही गोत्रमें हो गया। यह कथा आगे ‘नवम स्कन्ध’ के सातवें अध्यायमें आवेगी।

    (मुद्रित पृष्ठ 834)

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