श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.47

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अप्रमेयानुभावोऽयमकुतश्चिद्भयोऽमरः ।

नूनमेतद्विरोधेन मृत्युर्मे भविता न वा॥ ४७

aprameyānubhāvo'yamakutaścidbhayo'maraḥ |

nūnametadvirodhena mṛtyurme bhavitā na vā|| 47

अर्थ

न तो यह किसीसे डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है। इसकी शक्तिकी थाह नहीं है। अवश्य ही इसके विरोधसे मेरी मृत्यु होगी। सम्भव है, न भी हो’॥ ४७॥

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