श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.49

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

जितं त्वयैकेन जगत्त्रयं भ्रुवोर्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम् ।✎ 1535

न तस्य चिन्त्यं तव नाथ च१क्ष्महे न वै शिशूनां गुणदोषयोः पदम्॥ ४९✎ 962 2222

jitaṃ tvayaikena jagattrayaṃ bhruvorvijṛmbhaṇatrastasamastadhiṣṇyapam |

na tasya cintyaṃ tava nātha cakṣmahe na vai śiśūnāṃ guṇadoṣayoḥ padam|| 49

अर्थ

‘स्वामी! आपने अकेले ही तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली। आपके भौंहें टेढ़ी करनेपर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं। हमारे देखनेमें तो आपके लिये चिन्ताकी कोई बात नहीं है। भला, बच्चोंके खिलवाड़में भी भलाई-बुराई सोचनेकी कोई बात है॥ ४९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विद्महे।

    (मुद्रित पृष्ठ 834)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #962 शब्दोंके बीचका स्थान: च क्ष्महे → चक्ष्महे
  • #1535 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भ्रुवो- र्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम् → भ्रुवोर्विजृम्भणत्रस्तसमस्तधिष्ण्यपम्
  • #2222 टिप्पणी: → प्रा० पा०—विद्महे।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें