श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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टिप्पणी

25 शुद्धियाँ

#स्थानपहलेअबप्रमाण
22185.24 5.24 · टिप्पणी १ · पृष्ठ v1 p680 प्रा० पा०—परिक्षिप्तस्वर्लोकत्रयो।a note the print has, missing in the EPUB with its link
22195.24 5.24 · टिप्पणी २ · पृष्ठ v1 p680 प्रा० पा०—यद्येतत्साक्षात्कारो।a note the print has, missing in the EPUB with its link
22205.24 5.24 · टिप्पणी ३ · पृष्ठ v1 p680 प्रा० पा०—ऽन्यथेवेहोप०।a note the print has, missing in the EPUB with its link
22215.26 5.26 · टिप्पणी १ · पृष्ठ v1 p686 प्रा० पा०—कर्तृश्रद्धायाः।a note the print has, missing in the EPUB with its link
22227.5 7.5 · टिप्पणी १ · पृष्ठ v1 p834 प्रा० पा०—विद्महे।a note the print has, missing in the EPUB with its link
22238.3 8.3 · टिप्पणी १ · पृष्ठ v1 p918 प्रा० पा०—वन्तं नतोऽस्म्यहम्।a note the print has, missing in the EPUB with its link; the print's प्रा पा (without its ०) written as everywhere else
22248.10 8.10 · टिप्पणी १ · पृष्ठ v1 p956 प्रा० पा०—नैतत्।a note the print has, missing in the EPUB with its link
22258.10 8.10 · टिप्पणी २ · पृष्ठ v1 p956 प्रा० पा०—तस्मिन्।a note the print has, missing in the EPUB with its link
222610.47 10.47 · टिप्पणी १ · पृष्ठ v2 p428 कृष्णे।a note the print has, missing in the EPUB with its link
222710.63 · टिप्पणी २ · पृष्ठ v2 p536 णोपपन्नः।a note the print has, missing in the EPUB; the print itself sets no mark for it in the text (a slip of the print)
2228v2-back · टिप्पणी १ · पृष्ठ v2 p1009 (भागवतांकमें प्रकाशित ‘श्रीमद्भागवतकी अनुष्ठान-विधि’ शीर्षक दो लेखोंके आधारपर।)a note the print has, missing in the EPUB; the heading's raised १ now links to it
2229v2-back · टिप्पणी * · पृष्ठ v2 p1009 यह चिह्न स्कन्धकी समाप्ति और ÷ यह चिह्न दशमस्कन्धके पूर्वार्धकी समाप्तिका है।the key to the marks * and ÷ of the पारायण tables, printed at the foot of v2 p1009; missing in the EPUB
223010.3 10.3 · टिप्पणी † · पृष्ठ v2 p138 १. मेघ समुद्रके पास जाकर मन्द-मन्द गर्जना करते हुए कहते—जलनिधे! यह तुम्हारे उपदेश (पास आने) का फल है कि हमारे पास जल-ही-जल हो गया। अब ऐसा कुछ उपदेश करो कि जैसेthe print's note † is a note of its own; the EPUB had its text inside note 173
223110.3 · टिप्पणी * ऋषि, मुनि और देवता जब अपने सुमनकी वर्षा करनेके लिये मथुराकी ओर दौड़े, तब उनका आnote 173 keeps the print's * note only
223210.3 10.3 · टिप्पणी † · पृष्ठ v2 p144 १. श्रीकृष्ण शिशुको अपनी ओर आते देखकर यमुनाजीने विचार किया—अहा! जिनके चरणोंकी धूलि सत्पुरुषोंके मानस-ध्यानका विषय है, वे ही आज मेरे तटपर आ रहे हैं। वे आनन्द औरthe print's note † is a note of its own; the EPUB had its text inside note 177
223310.3 10.3 · टिप्पणी ‡ · पृष्ठ v2 p144 १. एकाएक यमुनाजीके मनमें विचार आया कि मेरे अगाध जलको देखकर कहीं श्रीकृष्ण यह न सोच लें कि मैं इसमें खेलूँगा कैसे, इसलिये वे तुरंत कहीं कण्ठभर, कहीं नाभिभर और कthe print's note ‡ is a note of its own; the EPUB had its text inside note 177
223410.3 · टिप्पणी * बलरामजीने विचार किया कि मैं बड़ा भाई बना तो क्या, सेवा ही मेरा मुख्य धर्म है। इnote 177 keeps the print's * note only
223510.5 10.5 · टिप्पणी † · पृष्ठ v2 p151 वंशका वर्णन करनेवाले। the print's note † is a note of its own; the EPUB had its text inside note 188
223610.5 10.5 · टिप्पणी ‡ · पृष्ठ v2 p151 समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट। जैसा कि कहा है—‘सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधा      वंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः॥’ the print's note ‡ is a note of its own; the EPUB had its text inside note 188
223710.5 · टिप्पणी * पौराणिक। note 188 keeps the print's * note only
223810.8 10.8 · टिप्पणी † · पृष्ठ v2 p178 यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा। the print's note † is a note of its own; the EPUB had its text inside note 206
223910.8 10.8 · टिप्पणी ‡ · पृष्ठ v2 p178 भगवान्‌के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा the print's note ‡ is a note of its own; the EPUB had its text inside note 206
224010.8 · टिप्पणी * मृद्-भक्षणके हेतु—१—भगवान् श्रीकृष्णने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही note 206 keeps the print's * note only
224110.9 10.9 · टिप्पणी † · पृष्ठ v2 p181 इस श्‍लोकमें भक्तके स्वरूपका निरूपण है। शरीरसे दधिमन्थनरूप सेवाकर्म हो रहा है, हृदयमें स्मरणकी धारा सतत प्रवाहित हो रही है, वाणीमें बाल-चरित्रका संगीत। भक्तके the print's note † is a note of its own; the EPUB had its text inside note 208
224210.9 · टिप्पणी * इस प्रसंगमें ‘एक समय’ का तात्पर्य है कार्तिक मास। पुराणोंमें इसे ‘दामोदरमास’ कnote 208 keeps the print's * note only

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