श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.56

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ते तु तद्गौरवात्सर्वे त्यक्तक्रीडापरिच्छदाः।

बाला न दूषितधियो द्वन्द्वारामेरितेहितैः॥ ५६

te tu tadgauravātsarve tyaktakrīḍāparicchadāḥ|

bālā na dūṣitadhiyo dvandvārāmeritehitaiḥ|| 56

अर्थ

युधिष्ठिर! वे सब अभी बालक ही थे, इसलिये राग-द्वेषपरायण विषयभोगी पुरुषोंके उपदेशोंसे और चेष्टाओंसे उनकी बुद्धि अभी दूषित नहीं हुई थी। इसीसे, और प्रह्लादजीके प्रति आदर-बुद्धि होनेसे उन सबने अपनी खेल-कूदकी सामग्रियोंको छोड़ दिया तथा प्रह्लादजीके पास जाकर उनके चारों ओर बैठ गये और उनके उपदेशमें मन लगाकर बड़े प्रेमसे एकटक उनकी ओर देखने लगे। भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त प्रह्लादका हृदय उनके प्रति करुणा और मैत्रीके भावसे भर गया तथा वे उनसे कहने लगे॥ ५६-५७॥

यह अर्थ श्लोक 56–57 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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