श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.55

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथ तान् श्लक्ष्णया वाचा प्रत्याहूय महाबुधः।

उवाच विद्वांस्तन्‍निष्ठां कृपया प्रहसन्‍निव॥ ५५

atha tān ślakṣṇayā vācā pratyāhūya mahābudhaḥ|

uvāca vidvāṃstanniṣṭhāṃ kṛpayā prahasanniva|| 55

अर्थ

प्रह्लादजी परम ज्ञानी थे, उनका प्रेम देखकर उन्होंने उन बालकोंको ही बड़ी मधुर वाणीसे पुकारकर अपने पास बुला लिया। उनसे उनके जन्म-मरणकी गति भी छिपी नहीं थी। उनपर कृपा करके हँसते हुए-से उन्हें उपदेश करने लगे॥ ५५॥

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