श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.16

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

विद्वानपीत्थं दनुजाः कुटुम्बं

पुष्णन्स्वलोकाय न कल्पते वै ।

यः२ स्वीयपारक्यविभिन्‍नभाव-

स्तमः प्रपद्येत यथा विमूढः॥ १६

vidvānapītthaṃ danujāḥ kuṭumbaṃ

puṣṇansvalokāya na kalpate vai |

yaḥ svīyapārakyavibhinnabhāva-

stamaḥ prapadyeta yathā vimūḍhaḥ|| 16

अर्थ

भाइयो! जो इस प्रकार अपने कुटुम्बियोंके पेट पालनेमें ही लगा रहता है—कभी भगवद्भजन नहीं करता—वह विद्वान् हो, तो भी उसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि अपने-परायेका भेद-भाव रहनेके कारण उसे भी अज्ञानियोंके समान ही तमःप्रधान गति प्राप्त होती है॥ १६॥✎ 1988

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—यत्स्वी०।

    (मुद्रित पृष्ठ 838)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1988 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): गवाँ → गँवा

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें