श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यतो न कश्चित् क्‍व च कुत्रचिद् वा

दीनः स्वमात्मानमलं समर्थः।

विमोचितुं कामदृशां विहार-

क्रीडामृगो यन्‍निगडो विसर्गः॥ १७

yato na kaścit kva ca kutracid vā

dīnaḥ svamātmānamalaṃ samarthaḥ|

vimocituṃ kāmadṛśāṃ vihāra-

krīḍāmṛgo yannigaḍo visargaḥ|| 17

अर्थ

जो कामिनियोंके मनोरंजनका सामान—उनका क्रीडामृग बन रहा है और जिसने अपने पैरोंमें सन्तानकी बेड़ी जकड़ ली है, वह बेचारा गरीब—चाहे कोई भी हो, कहीं भी हो—किसी भी प्रकारसे अपना उद्धार नहीं कर सकता॥ १७॥

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