श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ततो यतेत कुशलः क्षेमाय भयमाश्रितः।

शरीरं पौरुषं यावन्‍न विपद्येत पुष्कलम्॥ ५

tato yateta kuśalaḥ kṣemāya bhayamāśritaḥ|

śarīraṃ pauruṣaṃ yāvanna vipadyeta puṣkalam|| 5

अर्थ

हमारे सिरपर अनेकों प्रकारके भय सवार रहते हैं। इसलिये यह शरीर—जो भगवत्प्राप्तिके लिये पर्याप्त है—जबतक रोग-शोकादिग्रस्त होकर मृत्युके मुखमें नहीं चला जाता, तभीतक बुद्धिमान् पुरुषको अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये॥ ५॥✎ 589

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #589 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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