श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.14

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सोऽहं विकत्थमानस्य शिरः कायाद्धरामि ते।

गोपायेत हरिस्त्वाद्य यस्ते शरणमीप्सितम्॥ १४

so'haṃ vikatthamānasya śiraḥ kāyāddharāmi te|

gopāyeta haristvādya yaste śaraṇamīpsitam|| 14

अर्थ

अच्छा, तुझे इस खंभेमें भी दिखायी देता है! अरे, तू क्यों इतनी डींग हाँक रहा है? मैं अभी-अभी तेरा सिर धड़से अलग किये देता हूँ। देखता हूँ तेरा वह सर्वस्व हरि, जिसपर तुझे इतना भरोसा है, तेरी कैसे रक्षा करता है॥ १४॥

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