इस प्रकार कहता और सिंहनाद करता हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु हाथमें गदा लेकर नृसिंहभगवान्पर टूट पड़ा। परन्तु जैसे पतिंगा आगमें गिरकर अदृश्य हो जाता है, वैसे ही वह दैत्य भगवान्के तेजके भीतर जाकर लापता हो गया॥ २४॥✎ 607
एवं ब्रुवंस्त्वभ्यपतद् गदायुधो
नदन् नृसिंहं प्रति दैत्यकुञ्जरः।
अलक्षितोऽग्नौ पतितः पतङ्गमो
यथा नृसिंहौजसि सोऽसुरस्तदा॥ २४
इस प्रकार कहता और सिंहनाद करता हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु हाथमें गदा लेकर नृसिंहभगवान्पर टूट पड़ा। परन्तु जैसे पतिंगा आगमें गिरकर अदृश्य हो जाता है, वैसे ही वह दैत्य भगवान्के तेजके भीतर जाकर लापता हो गया॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 850) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/8/24/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—वंश्चाभ्य०।
(मुद्रित पृष्ठ 850)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्पर