श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

असाध्वमन्यन्त हृतौकसोऽमरा

घनच्छदा भारत सर्वधिष्ण्यपाः।

तं मन्यमानो निजवीर्यशङ्कितं

यद्धस्तमुक्तो नृहरिं महासुरः१।

पुनस्तमासज्जत खड्गचर्मणी

प्रगृह्य वेगेन जितश्रमो मृधे॥ २७

asādhvamanyanta hṛtaukaso'marā

ghanacchadā bhārata sarvadhiṣṇyapāḥ|

taṃ manyamāno nijavīryaśaṅkitaṃ

yaddhastamukto nṛhariṃ mahāsuraḥ|

punastamāsajjata khaḍgacarmaṇī

pragṛhya vegena jitaśramo mṛdhe|| 27

अर्थ

युधिष्ठिर! उस समय सब-के-सब लोकपाल बादलोंमें छिपकर इस युद्धको देख रहे थे। उनका स्वर्ग तो हिरण्यकशिपुने पहले ही छीन लिया था। जब उन्होंने देखा कि वह भगवान्‌के हाथसे छूट गया, तब वे और भी डर गये। हिरण्यकशिपुने भी यही समझा कि नृसिंहने मेरे बलवीर्यसे डरकर ही मुझे अपने हाथसे छोड़ दिया है। इस विचारसे उसकी थकान जाती रही और वह युद्धके लिये ढाल-तलवार लेकर फिर उनकी ओर दौड़ पड़ा॥ २७॥✎ 608 609 610 611 612

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—हामनाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 851)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #608 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #609 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #610 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #611 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #612 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्‌पर

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें