॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.8.28
तं श्येनवेगं शतचन्द्रवर्त्मभि-
श्चरन्तमच्छिद्रमुपर्यधो हरिः।
कृत्वाट्टहासं ख२रमुत्स्वनोल्बणं
निमीलिताक्षं जगृहे महाजवः॥ २८
taṃ śyenavegaṃ śatacandravartmabhi-
ścarantamacchidramuparyadho hariḥ|
kṛtvāṭṭahāsaṃ kharamutsvanolbaṇaṃ
nimīlitākṣaṃ jagṛhe mahājavaḥ|| 28
अर्थ
उस समय वह बाजकी तरह बड़े वेगसे ऊपर-नीचे उछल-कूदकर इस प्रकार ढाल-तलवारके पैंतरे बदलने लगा कि जिससे उसपर आक्रमण करनेका अवसर ही न मिले। तब भगवान्ने बड़े ऊँचे स्वरसे प्रचण्ड और भयंकर अट्टहास किया, जिससे हिरण्यकशिपुकी आँखें बंद हो गयीं। फिर बड़े वेगसे झपटकर भगवान्ने उसे वैसे ही पकड़ लिया, जैसे साँप चूहेको पकड़ लेता है। जिस हिरण्यकशिपुके चमड़ेपर वज्रकी चोटसे भी खरोंच नहीं आयी थी, वही अब उनके पंजेसे निकलनेके लिये जोरसे छटपटा रहा था। भगवान्ने सभाके दरवाजेपर ले जाकर उसे अपनी जाँघोंपर गिरा लिया और खेल-खेलमें अपने नखोंसे उसे उसी प्रकार फाड़ डाला, जैसे गरुड़ महाविषधर साँपको चीर डालते हैं॥ २८-२९॥✎ 608 609 610 611 612
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—खरकेसरोल्बणो।