श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.40

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ब्रह्मोवाच

नतोऽस्म्यनन्ताय दुरन्तशक्तये

विचित्रवीर्याय पवित्रकर्मणे।

विश्‍वस्य सर्गस्थितिसंयमान् गुणैः

स्वलीलया संदधतेऽव्ययात्मने॥ ४०

nato'smyanantāya durantaśaktaye

vicitravīryāya pavitrakarmaṇe|

viśvasya sargasthitisaṃyamān guṇaiḥ

svalīlayā saṃdadhate'vyayātmane|| 40

अर्थ

ब्रह्माजीने कहा—प्रभो! आप अनन्त हैं। आपकी शक्तिका कोई पार नहीं पा सकता। आपका पराक्रम विचित्र और कर्म पवित्र हैं। यद्यपि गुणोंके द्वारा आप लीलासे ही सम्पूर्ण विश्‍वकी उत्पत्ति, पालन और प्रलय यथोचित ढंगसे करते हैं—फिर भी आप उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, स्वयं निर्विकार रहते हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ४०॥

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