॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.21
माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः
कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः।
छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं
संसारचक्रमज कोऽतितरेत् त्वदन्यः॥ २१
māyā manaḥ sṛjati karmamayaṃ balīyaḥ
kālena coditaguṇānumatena puṃsaḥ|
chandomayaṃ yadajayārpitaṣoḍaśāraṃ
saṃsāracakramaja ko'titaret tvadanyaḥ|| 21
अर्थ
पुरुषकी अनुमतिसे कालके द्वारा गुणोंमें क्षोभ होनेपर माया मनःप्रधान लिंगशरीरका निर्माण करती है। यह लिंगशरीर बलवान्, कर्ममय एवं अनेक नाम-रूपोंमें आसक्त—छन्दोमय है। यही अविद्याके द्वारा कल्पित मन, दस इन्द्रिय और पाँच तन्मात्रा—इन सोलह विकाररूप अरोंसे युक्त संसार-चक्र है। जन्मरहित प्रभो! आपसे भिन्न रहकर ऐसा कौन पुरुष है, जो इस मनरूप संसारचक्रको पार कर जाय?॥ २१॥✎ 2002