सर्वशक्तिमान् प्रभो! माया इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डालकर ईखके समान मुझे पेर रही है। आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणोंको सर्वदा पराजित रखते हैं और कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनोंको अपने अधीन रखते हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे इससे बचाकर अपनी सन्निधिमें खींच लीजिये॥ २२॥✎ 2002
स त्वं हि नित्यविजितात्मगुणः स्वधाम्ना
कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः।
चक्रे विसृष्टमजयेश्वर षोडशारे
निष्पीड्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम्॥ २२
सर्वशक्तिमान् प्रभो! माया इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डालकर ईखके समान मुझे पेर रही है। आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणोंको सर्वदा पराजित रखते हैं और कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनोंको अपने अधीन रखते हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे इससे बचाकर अपनी सन्निधिमें खींच लीजिये॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.9.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 860) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/9/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#2002 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): टेढ़ीं → टेढ़ी