श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.23

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपाना-

मायुः श्रियो विभव इच्छति याञ्जनोऽयम्।

येऽस्मत्पितुः कुपितहासविजृम्भितभ्रू-

विस्फूर्जितेन लुलिताः स तु ते निरस्तः॥ २३

dṛṣṭā mayā divi vibho'khiladhiṣṇyapānā-

māyuḥ śriyo vibhava icchati yāñjano'yam|

ye'smatpituḥ kupitahāsavijṛmbhitabhrū-

visphūrjitena lulitāḥ sa tu te nirastaḥ|| 23

अर्थ

भगवन्! जिनके लिये संसारीलोग बड़े लालायित रहते हैं, स्वर्गमें मिलनेवाली समस्त लोकपालोंकी वह आयु, लक्ष्मी और ऐश्‍वर्य मैंने खूब देख लिये। जिस समय मेरे पिता तनिक क्रोध करके हँसते थे और उससे उनकी भौंहें थोड़ी टेढ़ी हो जाती थीं, तब उन स्वर्गकी सम्पत्तियोंके लिये कहीं ठिकाना नहीं रह जाता था, वे लुटती फिरती थीं। किन्तु आपने मेरे उन पिताको भी मार डाला॥ २३॥✎ 2002

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2002 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): टेढ़ीं → टेढ़ी

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें