श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.27

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्या-

ज्जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथापि।

संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसादः

सेवानुरूपमुदयो न परावरत्वम्॥ २७

naiṣā parāvaramatirbhavato nanu syā-

jjantoryathā''tmasuhṛdo jagatastathāpi|

saṃsevayā surataroriva te prasādaḥ

sevānurūpamudayo na parāvaratvam|| 27

अर्थ

दूसरे संसारी जीवोंके समान आपमें छोटे-बड़ेका भेदभाव नहीं है; क्योंकि आप सबके आत्मा और अकारण प्रेमी हैं। फिर भी कल्पवृक्षके समान आपका कृपा-प्रसाद भी सेवन-भजनसे ही प्राप्त होता है। सेवाके अनुसार ही जीवोंपर आपकी कृपाका उदय होता है, उसमें जातिगत उच्चता या नीचता कारण नहीं है॥ २७॥

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