॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.28
एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे
कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात्।
कृत्वाऽऽत्मसात् सुरर्षिणा भगवन् गृहीतः ✎ 1878
सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम्॥ २८
evaṃ janaṃ nipatitaṃ prabhavāhikūpe
kāmābhikāmamanu yaḥ prapatanprasaṅgāt|
kṛtvā''tmasāt surarṣiṇā bhagavan gṛhītaḥ
so'haṃ kathaṃ nu visṛje tava bhṛtyasevām|| 28
अर्थ
भगवन्! यह संसार एक ऐसा अँधेरा कुआँ है, जिसमें कालरूप सर्प डँसनेके लिये सदा तैयार रहता है। विषय-भोगोंकी इच्छावाले पुरुष उसीमें गिरे हुए हैं। मैं भी संगवश उसके पीछे उसीमें गिरने जा रहा था। परन्तु भगवन्! देवर्षि नारदने मुझे अपनाकर बचा लिया। तब भला, मैं आपके भक्तजनोंकी सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ॥ २८॥