॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.29
मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्च
मन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम्।
खड्गं प्रगृह्य यदवोचदसद्विधित्सु२-
स्त्वामीश्वरो मदपरोऽवतु कं हरामि॥ २९
matprāṇarakṣaṇamananta piturvadhaśca
manye svabhṛtyaṛṣivākyamṛtaṃ vidhātum|
khaḍgaṃ pragṛhya yadavocadasadvidhitsu-
stvāmīśvaro madaparo'vatu kaṃ harāmi|| 29
अर्थ
अनन्त! जिस समय मेरे पिताने अन्याय करनेके लिये कमर कसकर हाथमें खड्ग ले लिया और वह कहने लगा कि ‘यदि मेरे सिवा कोई और ईश्वर है तो तुझे बचा ले, मैं तेरा सिर काटता हूँ’, उस समय आपने मेरे प्राणोंकी रक्षा की और मेरे पिताका वध किया। मैं तो समझता हूँ कि आपने अपने प्रेमी भक्त सनकादि ऋषियोंका वचन सत्य करनेके लिये ही वैसा किया था॥ २९॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—दसून् बिभित्सु०।