श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.55

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं प्रलोभ्यमानोऽपि वरैर्लोकप्रलोभनैः।

एकान्तित्वाद् भगवति नैच्छत् तानसुरोत्तमः॥ ५५

evaṃ pralobhyamāno'pi varairlokapralobhanaiḥ|

ekāntitvād bhagavati naicchat tānasurottamaḥ|| 55

अर्थ

असुरकुलभूषण प्रह्लादजी भगवान्‌के अनन्य प्रेमी थे। इसलिये बड़े-बड़े लोगोंको प्रलोभनमें डालनेवाले वरोंके द्वारा प्रलोभित किये जानेपर भी उन्होंने उनकी इच्छा नहीं की॥ ५५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे
प्रह्रादचरिते भगवत्स्तवो नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥

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