असुरकुलभूषण प्रह्लादजी भगवान्के अनन्य प्रेमी थे। इसलिये बड़े-बड़े लोगोंको प्रलोभनमें डालनेवाले वरोंके द्वारा प्रलोभित किये जानेपर भी उन्होंने उनकी इच्छा नहीं की॥ ५५॥
एवं प्रलोभ्यमानोऽपि वरैर्लोकप्रलोभनैः।
एकान्तित्वाद् भगवति नैच्छत् तानसुरोत्तमः॥ ५५
असुरकुलभूषण प्रह्लादजी भगवान्के अनन्य प्रेमी थे। इसलिये बड़े-बड़े लोगोंको प्रलोभनमें डालनेवाले वरोंके द्वारा प्रलोभित किये जानेपर भी उन्होंने उनकी इच्छा नहीं की॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.9.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 866) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/9/55/