श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

अष्टम स्कन्ध

24 अध्याय · 931 श्लोक

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

श्रीमद्भागवतमहापुराणम्

अष्टमः स्कन्धः

  1. 1अथ प्रथमोऽध्यायःमन्वन्तरोंका वर्णन33 श्लोक
    पृष्ठ 905
  2. 2अथ द्वितीयोऽध्यायःग्राहके द्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना33 श्लोक
    पृष्ठ 909
  3. 3अथ तृतीयोऽध्यायःगजेन्द्रके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना33 श्लोक
    पृष्ठ 913
  4. 4अथ चतुर्थोऽध्यायःगज और ग्राहका पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार26 श्लोक
    पृष्ठ 918
  5. 5अथ पञ्चमोऽध्यायःदेवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और ब्रह्माकृत भगवान्‌की स्तुति50 श्लोक
    पृष्ठ 922
  6. 6अथ षष्ठोऽध्यायःदेवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना39 श्लोक
    पृष्ठ 929
  7. 7अथ सप्तमोऽध्यायःसमुद्रमन्थनका आरम्भ और भगवान् शंकरका विषपान46 श्लोक
    पृष्ठ 934
  8. 8अथाष्टमोऽध्यायःसमुद्रसे अमृतका प्रकट होना और भगवान्‌का मोहिनी-अवतार ग्रहण करना46 श्लोक
    पृष्ठ 940
  9. 9अथ नवमोऽध्यायःमोहिनीरूपसे भगवान्‌के द्वारा अमृत बाँटा जाना29 श्लोक
    पृष्ठ 947
  10. 10अथ दशमोऽध्यायःदेवासुर-संग्राम57 श्लोक
    पृष्ठ 951
  11. 11अथैकादशोऽध्यायःदेवासुर-संग्रामकी समाप्ति48 श्लोक
    पृष्ठ 957
  12. 12अथ द्वादशोऽध्यायःमोहिनीरूपको देखकर महादेवजीका मोहित होना47 श्लोक
    पृष्ठ 963
  13. 13अथ त्रयोदशोऽध्यायःआगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन36 श्लोक
    पृष्ठ 968
  14. 14अथ चतुर्दशोऽध्यायःमनु आदिके पृथक्-पृथक् कर्मोंका निरूपण11 श्लोक
    पृष्ठ 972
  15. 15अथ पञ्चदशोऽध्यायःराजा बलिकी स्वर्गपर विजय36 श्लोक
    पृष्ठ 974
  16. 16अथ षोडशोऽध्यायःकश्यपजीके द्वारा अदितिको पयोव्रतका उपदेश62 श्लोक
    पृष्ठ 978
  17. 17अथ सप्तदशोऽध्यायःभगवान्‌का प्रकट होकर अदितिको वर देना28 श्लोक
    पृष्ठ 985
  18. 18अथाष्टादशोऽध्यायःवामनभगवान्‌का प्रकट होकर राजा बलिकी यज्ञशालामें पधारना32 श्लोक
    पृष्ठ 987
  19. 19अथैकोनविंशोऽध्यायःभगवान् वामनका बलिसे तीन पग पृथ्वी माँगना, बलिका वचन देना और शुक्राचार्यजीका उन्हें रोकना43 श्लोक
    पृष्ठ 992
  20. 20अथ विंशोऽध्यायःभगवान् वामनजीका विराट्रूप होकर दो ही पगसे पृथ्वी और स्वर्गको नाप लेना34 श्लोक
    पृष्ठ 998
  21. 21अथैकविंशोऽध्यायःबलिका बाँधा जाना34 श्लोक
    पृष्ठ 1002
  22. 22अथ द्वाविंशोऽध्यायःबलिके द्वारा भगवान्‌की स्‍तुति और भगवान्‌का उसपर प्रसन्‍न होना36 श्लोक
    पृष्ठ 1005
  23. 23अथ त्रयोविंशोऽध्यायःबलिका बन्धनसे छूटकर सुतललोकको जाना31 श्लोक
    पृष्ठ 1011
  24. 24अथ चतुर्विंशोऽध्यायःभगवान्‌के मत्स्यावतारकी कथा61 श्लोक
    पृष्ठ 1013

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