श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2

33 श्लोक · 5 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: प्रथम खण्ड, पृष्ठ 909–913

श्लोक-सूची
पृष्ठ 909

श्रीशुक उवाच

आसीद् गिरिवरो राजंस्त्रिकूट इति विश्रुतः।

क्षीरोदेनावृतः श्रीमान्योजनायुतमुच्छ्रितः॥ १8.2.1

ता३वता विस्तृतः पर्यक् त्रिभिः शृङ्गैः पयोनिधिम्।

दिशः खं रोचयन्‍नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः॥ २8.2.2

अन्यैश्‍च ककुभः सर्वा रत्नधातुविचित्रितैः।

नानाद्रुमलतागुल्मैर्निर्घोषैर्निर्झराम्भसाम् ॥ ३8.2.3

स चावनिज्यमानाङ्‌घ्रिः समन्तात् पयऊर्मिभिः।

करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः॥ ४8.2.4

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! क्षीरसागरमें त्रिकूट नामका एक प्रसिद्ध सुन्दर एवं श्रेष्ठ पर्वत था। वह दस हजार योजन ऊँचा था॥ १॥ उसकी लंबाई-चौड़ाई भी चारों ओर इतनी ही थी। उसके चाँदी, लोहे और सोनेके तीन शिखरोंकी छटासे समुद्र, दिशाएँ और आकाश जगमगाते रहते थे॥ २॥ और भी उसके कितने ही शिखर ऐसे थे जो रत्नों और धातुओंकी रंग-बिरंगी छटा दिखाते हुए सब दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनमें विविध जातिके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं। झरनोंकी झर-झरसे वह गुंजायमान होता रहता था॥ ३॥ सब ओरसे समुद्रकी लहरें आ-आकर उस पर्वतके निचले भागसे टकरातीं, उस समय ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराजके पाँव पखार रही हों। उस पर्वतके हरे पन्‍नेके पत्थरोंसे वहाँकी भूमि ऐसी साँवली हो गयी थी, जैसे उसपर हरी-भरी दूब लग रही हो॥ ४॥ ✎ 2026

पृष्ठ 910

सिद्धचारणगन्धर्वविद्याधरमहोरगैः ।

किन्‍नरैरप्सरोभिश्‍च क्रीडद्भिर्जुष्टकन्दरः॥ ५ 8.2.5

यत्र संगीतसन्‍नादैर्नदद‍्गुहममर्षया।

अभिगर्जन्ति हरयः श्लाघिनः परशङ्कया॥ ६8.2.6

उसकी कन्दराओंमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, नाग, किन्‍नर और अप्सराएँ आदि विहार करनेके लिये प्रायः बने ही रहते थे॥ ५॥ जब उनके संगीतकी ध्वनि चट्टानोंसे टकराकर गुफाओंमें प्रतिध्वनित होने लगती थी, तब बड़े-बड़े गर्वीले सिंह उसे दूसरे सिंहकी ध्वनि समझकर सह न पाते और अपनी गर्जनासे उसे दबा देनेके लिये और जोरसे गरजने लगते थे॥ ६॥✎ 1972

नानारण्यपशुव्रातसङ्कुलद्रोण्यलङ्कृतः ।

चित्रद्रुमसुरोद्यानकलकण्ठविहङ्गमः ॥ ७8.2.7

सरित्सरोभिरच्छोदैः पुलिनैर्मणिवालुकैः।

देवस्त्रीमज्जनामोदसौरभाम्ब्वनिलैर्युतः ॥ ८8.2.8

पृष्ठ 910

उस पर्वतकी तलहटी तरह-तरहके जंगली जानवरोंके झुंडोंसे सुशोभित रहती थी। अनेकों प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए देवताओंके उद्यानमें सुन्दर-सुन्दर पक्षी मधुर कण्ठसे चहकते रहते थे॥ ७॥ उसपर बहुत-सी नदियाँ और सरोवर भी थे। उनका जल बड़ा निर्मल था। उनके पुलिनपर मणियोंकी बालू चमकती रहती थी। उनमें देवांगनाएँ स्नान करती थीं जिससे उनका जल अत्यन्त सुगन्धित हो जाता था। उसकी सुरभि लेकर भीनी-भीनी वायु चलती रहती थी॥ ८॥

तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः।

उद्यानमृतुमन्‍नाम आक्रीडं सुरयोषिताम्॥ ९8.2.9

पर्वतराज त्रिकूटकी तराईमें भगवत्प्रेमी महात्मा भगवान् वरुणका एक उद्यान था। उसका नाम था ऋतुमान्। उसमें देवांगनाएँ क्रीडा करती रहती थीं॥ ९॥

सर्वतोऽलङ्कृतं दिव्यैर्नित्यं पुष्पफलद्रुमैः।

मन्दारैः पारिजातैश्‍च पाटलाशोकचम्पकैः॥ १० 8.2.10

चूतैः प्रियालैः पनसैराम्रैराम्रातकैरपि।

क्रमुकैर्नालिकेरैश्‍च खर्जूरैर्बीजपूरकैः॥ ११ 8.2.11

मधूकैः सालतालैश्‍च तमालैरसनार्जुनैः।

अरिष्टोदुम्बरप्लक्षैर्वटैः किंशुकचन्दनैः॥ १२ 8.2.12

पिचुमन्दैः कोविदारैः सरलैः सुरदारुभिः।

द्राक्षेक्षुरम्भाजम्बूभिर्बदर्यक्षाभयामलैः ॥ १३ 8.2.13

बिल्वैः कपित्थैर्जम्बीरैर्वृतो भल्लातकादिभिः।

तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्काञ्चनपङ्कजम्॥ १४ 8.2.14

कुमुदोत्पलकह्लारशतपत्रश्रियोर्जितम् ।

मत्तषट्पदनिर्घुष्टं शकुन्तैश्‍च कलस्वनैः॥ १५ 8.2.15

हंसकारण्डवाकीर्णं चक्राह्वैः सारसैरपि।

जलकुक्कुटकोयष्टिदात्यूहकुलकूजितम् ॥ १६ 8.2.16

पृष्ठ 911

मत्स्यकच्छपसञ्चारचलत्प१द्मरजःपयः।

कदम्बवेतसन२लनीपवञ्जुलकैर्वृतम् ॥ १७8.2.17

उसमें सब ओर ऐसे दिव्य वृक्ष शोभायमान थे, जो फलों और फूलोंसे सर्वदा लदे ही रहते थे। उस उद्यानमें मन्दार, पारिजात, गुलाब, अशोक, चम्पा, तरह-तरहके आम, प्रियाल, कटहल, आमड़ा, सुपारी, नारियल, खजूर, बिजौरा, महुआ, साखू, ताड़, तमाल, असन, अर्जुन, रीठा, गूलर, पाकर, बरगद, पलास, चन्दन, नीम, कचनार, साल, देवदारु, दाख, ईख, केला, जामुन, बेर, रुद्राक्ष, हर्रे, आँवला, बेल, कैथ, नीबू और भिलावे आदिके वृक्ष लहराते रहते थे। उस उद्यानमें एक बड़ा भारी सरोवर था। उसमें सुनहले कमल खिल रहे थे॥ १०—१४॥ और भी विविध जातिके कुमुद, उत्पल, कह्लार, शतदल आदि कमलोंकी अनूठी छटा छिटक रही थी। मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। मनोहर पक्षी कलरव कर रहे थे। हंस, कारण्डव, चक्रवाक और सारस दल-के-दल भरे हुए थे। पनडुब्बी, बतख और पपीहे कूज रहे थे। मछली और कछुओंके चलनेसे कमलके फूल हिल जाते थे, जिससे उनका पराग झड़कर जलको सुन्दर और सुगन्धित बना देता था। कदम्ब, बेंत, नरकुल, कदम्बलता, बेन आदि वृक्षोंसे वह घिरा था॥ १५—१७॥

कुन्दैः कुरबकाशोकैः शिरीषैः कुट३जेङ्गुदैः।

कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्‍नागजातिभिः॥ १८8.2.18

मल्लिकाशतपत्रैश्‍च माधवीजालकादिभिः।

शोभितं तीरजैश्चान्यैर्नित्यर्तुभिरलं द्रुमैः॥ १९8.2.19

पृष्ठ 911

कुन्द, कुरबक (कटसरैया), अशोक, सिरस, वनमल्लिका, लिसौड़ा, हरसिंगार, सोनजूही, नाग, पुन्‍नाग, जाती, मल्लिका, शतपत्र, माधवी और मोगरा आदि सुन्दर-सुन्दर पुष्पवृक्ष एवं तटके दूसरे वृक्षोंसे भी—जो प्रत्येक ऋतुमें हरे-भरे रहते थे—वह सरोवर शोभायमान रहता था॥ १८-१९॥

तत्रैकदा तद्गिरिकाननाश्रयः

करेणुभिर्वारणयूथपश्‍चरन् ।

सकण्टकान् कीचकवेणुवेत्रवद्

विशालगुल्मं प्ररुजन्वनस्पतीन्॥ २० 8.2.20

यद्गन्धमात्राद्धरयो गजेन्द्रा

व्याघ्रादयो व्यालमृगाः सखड्गाः।

महोरगाश्चापि भयाद् द्रवन्ति

सगौरकृष्णाः शरभाश्‍चमर्यः॥ २१ 8.2.21

वृका वराहा महिषर्क्षशल्या

गोपुच्छसालावृकमर्कटाश्‍च ।

अन्यत्र क्षुद्रा हरिणाः शशादय-

श्‍चरन्त्यभीता यदनुग्रहेण॥ २२ 8.2.22

स घर्मतप्तः करिभिः करेणुभि-

र्वृतो मदच्युत्कलभैरनुद्रुतः।

गिरिं गरिम्णा परितः प्रकम्पयन्

निषेव्यमाणोऽलिकुलैर्मदाशनैः ॥ २३ 8.2.23

सरोऽनिलं पङ्कजरेणुरूषितं

जिघ्रन्विदूरान्मदविह्वलेक्षणः ।

वृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन तत्

सरोवराभ्याशमथागमद् द्रुतम्॥ २४8.2.24

उस पर्वतके घोर जंगलमें बहुत-सी हथिनियोंके साथ एक गजेन्द्र निवास करता था। वह बड़े-बड़े शक्तिशाली हाथियोंका सरदार था। एक दिन वह उसी पर्वतपर अपनी हथिनियोंके साथ काँटेवाले कीचक, बाँस, बेंत, बड़ी-बड़ी झाड़ियों और पेड़ोंको रौंदता हुआ घूम रहा था॥ २०॥ उसकी गन्धमात्रसे सिंह, हाथी, बाघ, गैंड़े आदि हिंस्र जन्तु, नाग तथा काले-गोरे शरभ और चमरी गाय आदि डरकर भाग जाया करते थे॥ २१॥ और उसकी कृपासे भेड़िये, सूअर, भैंसे, रीछ, शल्य, लंगूर तथा कुत्ते, बंदर, हरिन और खरगोश आदि क्षुद्र जीव सब कहीं निर्भय विचरते रहते थे॥ २२॥ उसके पीछे-पीछे हाथियोंके छोटे-छोटे बच्चे दौड़ रहे थे। बड़े-बड़े हाथी और हथिनियाँ भी उसे घेरे हुए चल रही थीं। उसकी धमकसे पहाड़ एकबारगी काँप उठता था। उसके गण्डस्थलसे टपकते हुए मदका पान करनेके लिये साथ-साथ भौंरे उड़ते जा रहे थे। मदके कारण उसके नेत्र विह्वल हो रहे थे। बड़े जोरकी धूप थी, इसलिये वह व्याकुल हो गया और उसे तथा उसके साथियोंको प्यास भी सताने लगी। उस समय दूरसे ही कमलके परागसे सुवासित वायुकी गन्ध सूँघकर वह उसी सरोवरकी ओर चल पड़ा, जिसकी शीतलता और सुगन्ध लेकर वायु आ रही थी। थोड़ी ही देरमें वेगसे चलकर वह सरोवरके तटपर जा पहुँचा॥ २३-२४॥ ✎ 2027 2028

पृष्ठ 912

विगाह्य तस्मिन्‍नमृताम्बु निर्मलं

हेमारविन्दोत्पलरेणुवासितम् ।

पपौ निकामं निजपुष्करोद‍्धृत-

मात्मानमद्भिः स्नपयन्गतक्लमः॥ २५8.2.25

पृष्ठ 912

उस सरोवरका जल अत्यन्त निर्मल एवं अमृतके समान मधुर था। सुनहले और अरुण कमलोंकी केसरसे वह महक रहा था। गजेन्द्रने पहले तो उसमें घुसकर अपनी सूँड़से उठा-उठा जी भरकर जल पिया, फिर उस जलमें स्नान करके अपनी थकान मिटायी॥ २५॥

स्वपुष्करेणोद‍्धृतशीकराम्बुभि-

र्निपाययन्संस्नपयन्यथा गृही।

घृणी करेणूः कलभांश्‍च दुर्मदो

नाचष्ट कृच्छ्रं कृपणोऽजमायया॥ २६ 8.2.26

गजेन्द्र गृहस्थ पुरुषोंकी भाँति मोहग्रस्त होकर अपनी सूँड़से जलकी फुहारें छोड़-छोड़कर साथकी हथिनियों और बच्चोंको नहलाने लगा तथा उनके मुँहमें सूँड़ डालकर जल पिलाने लगा। भगवान्‌की मायासे मोहित हुआ गजेन्द्र उन्मत्त हो रहा था। उस बेचारेको इस बातका पता ही न था कि मेरे सिरपर बहुत बड़ी विपत्ति मँडरा रही है॥ २६॥✎ 656

तं तत्र कश्चिन्‍नृप दैवचोदितो

ग्राहो बलीयांश्‍चरणे रुषाग्रहीत्।

यदृच्छयैवं व्यसनं गतो गजो

यथाबलं सोऽतिबलो विचक्रमे॥ २७8.2.27

परीक्षित्! गजेन्द्र जिस समय इतना उन्मत्त हो रहा था, उसी समय प्रारब्धकी प्रेरणासे एक बलवान् ग्राहने क्रोधमें भरकर उसका पैर पकड़ लिया। इस प्रकार अकस्मात् विपत्तिमें पड़कर उस बलवान् गजेन्द्रने अपनी शक्तिके अनुसार अपनेको छुड़ानेकी बड़ी चेष्टा की, परन्तु छुड़ा न सका॥ २७॥

तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो

विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा।

विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः

पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन्॥ २८8.2.28

दूसरे हाथी, हथिनियों और उनके बच्चोंने देखा कि उनके स्वामीको बलवान् ग्राह बड़े वेगसे खींच रहा है और वे बहुत घबरा रहे हैं। उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बड़ी विकलतासे चिग्घाड़ने लगे। बहुतोंने उसे सहायता पहुँचाकर जलसे बाहर निकाल लेना चाहा, परन्तु इसमें भी वे असमर्थ ही रहे॥ २८॥

नियुध्यतोरेवमिभेन्द्रनक्रयो-

र्विकर्षतोरन्तरतो बहिर्मिथः।

समाः सहस्रं व्यगमन् महीपते

सप्राणयोश्चित्रममंसतामराः ॥ २९8.2.29

गजेन्द्र और ग्राह अपनी-अपनी पूरी शक्ति लगाकर भिड़े हुए थे। कभी गजेन्द्र ग्राहको बाहर खींच लाता तो कभी ग्राह गजेन्द्रको भीतर खींच ले जाता। परीक्षित्! इस प्रकार उनको लड़ते- लड़ते एक हजार वर्ष बीत गये और दोनों ही जीते रहे। यह घटना देखकर देवता भी आश्‍चर्यचकित हो गये॥ २९॥

ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसां

कालेन दीर्घेण महानभूद् व्ययः।

पृष्ठ 913

विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो

विपर्ययोऽभूत् सकलं जलौकसः॥ ३०8.2.30

अन्तमें बहुत दिनोंतक बार-बार जलमें खींचे जानेसे गजेन्द्रका शरीर शिथिल पड़ गया। न तो उसके शरीरमें बल रह गया और न मनमें उत्साह। शक्ति भी क्षीण हो गयी। इधर ग्राह तो जलचर ही ठहरा। इसलिये उसकी शक्ति क्षीण होनेके स्थानपर बढ़ गयी, वह बड़े उत्साहसे और भी बल लगाकर गजेन्द्रको खींचने लगा॥ ३०॥

इत्थं गजेन्द्रः स यदाऽऽप संकटं प्राणस्य देही विवशो यदृच्छया।

अपारयन्‍नात्मविमोक्षणे चिरं दध्याविमां१ बुद्धिमथाभ्यपद्यत॥ ३१8.2.31

पृष्ठ 913

इस प्रकार देहाभिमानी गजेन्द्र अकस्मात् प्राणसंकटमें पड़ गया और अपनेको छुड़ानेमें सर्वथा असमर्थ हो गया। बहुत देरतक उसने अपने छुटकारेके उपायपर विचार किया, अन्तमें वह इस निश्‍चयपर पहुँचा॥ ३१॥

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम्।

ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतोऽप्यहं च तं यामि परं परायणम्॥ ३२8.2.32✎ 1537

‘यह ग्राह विधाताकी फाँसी ही है। इसमें फँसकर मैं आतुर हो रहा हूँ। जब मुझे मेरे बराबरके हाथी भी इस विपत्तिसे न उबार सके तब ये बेचारी हथिनियाँ तो छुड़ा ही कैसे सकती हैं। इसलिये अब मैं सम्पूर्ण विश्‍वके एकमात्र आश्रय भगवान्‌की ही शरण लेता हूँ॥ ३२॥✎ 657

यः कश्‍चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात् प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्।

भीतं प्रपन्‍नं परिपाति यद्भयान्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि॥ ३३8.2.33✎ 1538

काल बड़ा बली है। यह साँपके समान बड़े प्रचण्ड वेगसे सबको निगल जानेके लिये दौड़ता ही रहता है। इससे अत्यन्त भयभीत होकर जो कोई भगवान्‌की शरणमें चला जाता है, उसे वे प्रभु अवश्य-अवश्य बचा लेते हैं। उनके भयसे भीत होकर मृत्यु भी अपना काम ठीक-ठीक पूरा करता है। वही प्रभु सबके आश्रय हैं। मैं उन्हींकी शरण ग्रहण करता हूँ’॥ ३३॥✎ 658

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुवर्णने
गजेन्द्रोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः
॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—तावान् सुविस्तृतो ह्यासीत्।

    (मुद्रित पृष्ठ 909)
  2. १

    प्रा० पा०—त्पङ्करजः।

    (मुद्रित पृष्ठ 911)
  3. २

    प्रा० पा०—लसद्विविधैः पुलिनैर्वृतम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 911)
  4. ३

    प्रा० पा०—कुटजद्रुमैः।

    (मुद्रित पृष्ठ 911)
  5. १

    प्रा० पा०—दैवादिमां।

    (मुद्रित पृष्ठ 913)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें