॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.2.5
सिद्धचारणगन्धर्वविद्याधरमहोरगैः ।
किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीडद्भिर्जुष्टकन्दरः॥ ५
siddhacāraṇagandharvavidyādharamahoragaiḥ |
kinnarairapsarobhiśca krīḍadbhirjuṣṭakandaraḥ|| 5
अर्थ
उसकी कन्दराओंमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, नाग, किन्नर और अप्सराएँ आदि विहार करनेके लिये प्रायः बने ही रहते थे॥ ५॥✎ 1972