जब उनके संगीतकी ध्वनि चट्टानोंसे टकराकर गुफाओंमें प्रतिध्वनित होने लगती थी, तब बड़े-बड़े गर्वीले सिंह उसे दूसरे सिंहकी ध्वनि समझकर सह न पाते और अपनी गर्जनासे उसे दबा देनेके लिये और जोरसे गरजने लगते थे॥ ६॥✎ 1972
यत्र संगीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया।
अभिगर्जन्ति हरयः श्लाघिनः परशङ्कया॥ ६
जब उनके संगीतकी ध्वनि चट्टानोंसे टकराकर गुफाओंमें प्रतिध्वनित होने लगती थी, तब बड़े-बड़े गर्वीले सिंह उसे दूसरे सिंहकी ध्वनि समझकर सह न पाते और अपनी गर्जनासे उसे दबा देनेके लिये और जोरसे गरजने लगते थे॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.2.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 910) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/2/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1972 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उसके → उनके