सब ओरसे समुद्रकी लहरें आ-आकर उस पर्वतके निचले भागसे टकरातीं, उस समय ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराजके पाँव पखार रही हों। उस पर्वतके हरे पन्नेके पत्थरोंसे वहाँकी भूमि ऐसी साँवली हो गयी थी, जैसे उसपर हरी-भरी दूब लग रही हो॥ ४॥✎ 2026
स चावनिज्यमानाङ्घ्रिः समन्तात् पयऊर्मिभिः।
करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः॥ ४
सब ओरसे समुद्रकी लहरें आ-आकर उस पर्वतके निचले भागसे टकरातीं, उस समय ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराजके पाँव पखार रही हों। उस पर्वतके हरे पन्नेके पत्थरोंसे वहाँकी भूमि ऐसी साँवली हो गयी थी, जैसे उसपर हरी-भरी दूब लग रही हो॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.2.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 909) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/2/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)