और भी उसके कितने ही शिखर ऐसे थे जो रत्नों और धातुओंकी रंग-बिरंगी छटा दिखाते हुए सब दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनमें विविध जातिके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं। झरनोंकी झर-झरसे वह गुंजायमान होता रहता था॥ ३॥✎ 2026
अन्यैश्च ककुभः सर्वा रत्नधातुविचित्रितैः।
नानाद्रुमलतागुल्मैर्निर्घोषैर्निर्झराम्भसाम् ॥ ३
और भी उसके कितने ही शिखर ऐसे थे जो रत्नों और धातुओंकी रंग-बिरंगी छटा दिखाते हुए सब दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनमें विविध जातिके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं। झरनोंकी झर-झरसे वह गुंजायमान होता रहता था॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.2.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 909) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/2/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)