श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मत्स्यकच्छपसञ्चारचलत्प१द्मरजःपयः।

कदम्बवेतसन२लनीपवञ्जुलकैर्वृतम् ॥ १७

matsyakacchapasañcāracalatpadmarajaḥpayaḥ|

kadambavetasanalanīpavañjulakairvṛtam || 17

अर्थ

और भी विविध जातिके कुमुद, उत्पल, कह्लार, शतदल आदि कमलोंकी अनूठी छटा छिटक रही थी। मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। मनोहर पक्षी कलरव कर रहे थे। हंस, कारण्डव, चक्रवाक और सारस दल-के-दल भरे हुए थे। पनडुब्बी, बतख और पपीहे कूज रहे थे। मछली और कछुओंके चलनेसे कमलके फूल हिल जाते थे, जिससे उनका पराग झड़कर जलको सुन्दर और सुगन्धित बना देता था। कदम्ब, बेंत, नरकुल, कदम्बलता, बेन आदि वृक्षोंसे वह घिरा था॥ १५—१७॥

यह अर्थ श्लोक 15–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—त्पङ्करजः।

    (मुद्रित पृष्ठ 911)
  2. २

    प्रा० पा०—लसद्विविधैः पुलिनैर्वृतम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 911)

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