॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.2.11
चूतैः प्रियालैः पनसैराम्रैराम्रातकैरपि।
क्रमुकैर्नालिकेरैश्च खर्जूरैर्बीजपूरकैः॥ ११
cūtaiḥ priyālaiḥ panasairāmrairāmrātakairapi|
kramukairnālikeraiśca kharjūrairbījapūrakaiḥ|| 11
अर्थ
उसमें सब ओर ऐसे दिव्य वृक्ष शोभायमान थे, जो फलों और फूलोंसे सर्वदा लदे ही रहते थे। उस उद्यानमें मन्दार, पारिजात, गुलाब, अशोक, चम्पा, तरह-तरहके आम, प्रियाल, कटहल, आमड़ा, सुपारी, नारियल, खजूर, बिजौरा, महुआ, साखू, ताड़, तमाल, असन, अर्जुन, रीठा, गूलर, पाकर, बरगद, पलास, चन्दन, नीम, कचनार, साल, देवदारु, दाख, ईख, केला, जामुन, बेर, रुद्राक्ष, हर्रे, आँवला, बेल, कैथ, नीबू और भिलावे आदिके वृक्ष लहराते रहते थे। उस उद्यानमें एक बड़ा भारी सरोवर था। उसमें सुनहले कमल खिल रहे थे॥ १०—१४॥