श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो

विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा।

विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः

पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन्॥ २८

tathā''turaṃ yūthapatiṃ kareṇavo

vikṛṣyamāṇaṃ tarasā balīyasā|

vicukruśurdīnadhiyo'pare gajāḥ

pārṣṇigrahāstārayituṃ na cāśakan|| 28

अर्थ

दूसरे हाथी, हथिनियों और उनके बच्चोंने देखा कि उनके स्वामीको बलवान् ग्राह बड़े वेगसे खींच रहा है और वे बहुत घबरा रहे हैं। उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बड़ी विकलतासे चिग्घाड़ने लगे। बहुतोंने उसे सहायता पहुँचाकर जलसे बाहर निकाल लेना चाहा, परन्तु इसमें भी वे असमर्थ ही रहे॥ २८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें