श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.15

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

ईहते भगवानीशो न हि तत्र विषज्जते।

आत्मलाभेन पूर्णार्थो नावसीदन्ति येऽनु तम्॥ १५

īhate bhagavānīśo na hi tatra viṣajjate|

ātmalābhena pūrṇārtho nāvasīdanti ye'nu tam|| 15

अर्थ

यों तो सर्वशक्तिमान् भगवान् भी कर्म करते हैं, परन्तु वे आत्मलाभसे पूर्णकाम होनेके कारण उन कर्मोंमें आसक्त नहीं होते। अतः उन्हींका अनुसरण करके अनासक्त रहकर कर्म करनेवाले भी कर्मबन्धनसे मुक्त ही रहते हैं॥ १५॥

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