श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यद्यपि दानवों और दैत्योंने बड़ी सावधानीसे समुद्रमन्थनकी चेष्टा की थी, फिर भी भगवान्से विमुख होनेके कारण उन्हें अमृतकी प्राप्ति नहीं हुई॥ १॥✎ 723724
इति दानवदैतेया नाविन्दन्नमृतं नृप।
युक्ताः कर्मणि यत्ताश्च वासुदेवपराङ्मुखाः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यद्यपि दानवों और दैत्योंने बड़ी सावधानीसे समुद्रमन्थनकी चेष्टा की थी, फिर भी भगवान्से विमुख होनेके कारण उन्हें अमृतकी प्राप्ति नहीं हुई॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 951) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)