युद्धकी समस्त सामग्रियाँ उसमें सुसज्जित थीं। परीक्षित्! वह इतना आश्चर्यमय था कि कभी दिखलायी पड़ता तो कभी अदृश्य हो जाता। वह इस समय कहाँ है—जब इस बातका अनुमान भी नहीं किया जा सकता था तब बतलाया तो कैसे जा सकता था॥ १७॥✎ 20322033
सर्वसाङ्ग्रामिकोपेतं सर्वाश्चर्यमयं प्रभो।
अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं दृश्यमानमदर्शनम्॥ १७
युद्धकी समस्त सामग्रियाँ उसमें सुसज्जित थीं। परीक्षित्! वह इतना आश्चर्यमय था कि कभी दिखलायी पड़ता तो कभी अदृश्य हो जाता। वह इस समय कहाँ है—जब इस बातका अनुमान भी नहीं किया जा सकता था तब बतलाया तो कैसे जा सकता था॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 953) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)