श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.25

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

ऐरावतं दिक्करिणमारूढः शुशुभे स्वराट्।

यथा स्रवत्प्रस्रवणमुदयाद्रिमहर्पतिः॥ २५

airāvataṃ dikkariṇamārūḍhaḥ śuśubhe svarāṭ|

yathā sravatprasravaṇamudayādrimaharpatiḥ|| 25

अर्थ

वे अपने वाहन ऐरावत नामक दिग्गजपर सवार हुए। उसके कपोलोंसे मद बह रहा था। इसलिये इन्द्रकी ऐसी शोभा हुई, मानो भगवान् सूर्य उदयाचलपर आरूढ़ हों और उससे अनेकों झरने बह रहे हों॥ २५॥✎ 2032 2033

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2032 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2033 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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