दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो गयीं। दो-दोकी जोड़ियाँ बनाकर वे लोग लड़ने लगे। कोई आगे बढ़ रहा था, तो कोई नाम ले-लेकर ललकार रहा था। कोई-कोई मर्मभेदी वचनोंके द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वीको धिक्कार रहा था॥ २७॥✎ 20322033
तेऽन्योन्यमभिसंसृत्य क्षिपन्तो मर्मभिर्मिथः।
आह्वयन्तो विशन्तोऽग्रे युयुधुर्द्वन्द्वयोधिनः॥ २७
दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो गयीं। दो-दोकी जोड़ियाँ बनाकर वे लोग लड़ने लगे। कोई आगे बढ़ रहा था, तो कोई नाम ले-लेकर ललकार रहा था। कोई-कोई मर्मभेदी वचनोंके द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वीको धिक्कार रहा था॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 953) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/10/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)