श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.32

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

वृषाकपिस्तु जम्भेन महिषेण विभावसुः।

इल्वलः सह वातापिर्ब्रह्मपुत्रैररिन्दम॥ ३२

vṛṣākapistu jambhena mahiṣeṇa vibhāvasuḥ|

ilvalaḥ saha vātāpirbrahmaputrairarindama|| 32

अर्थ

परीक्षित्! जम्भासुरसे महादेवजीकी, महिषासुरसे अग्‍निदेवकी और वातापि तथा इल्वलसे ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदिकी ठन गयी॥ ३२॥✎ 1987

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1987 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): महोदवजीकी → महादेवजीकी

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