श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.57

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-

च्चक्रेण कृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम्।

आहत्य तिग्मगदयाहनदण्डजेन्द्रं

तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः॥ ५७

mālī sumālyatibalau yudhi petaturya-

ccakreṇa kṛttaśirasāvatha mālyavāṃstam|

āhatya tigmagadayāhanadaṇḍajendraṃ

tāvacchiro'cchinadarernadato'riṇā''dyaḥ|| 57

अर्थ

माली और सुमाली—दो दैत्य बड़े बलवान् थे, भगवान्‌ने युद्धमें अपने चक्रसे उनके सिर भी काट डाले और वे निर्जीव होकर गिर पड़े। तदनन्तर माल्यवान्‍ने अपनी प्रचण्ड गदासे गरुड़पर बड़े वेगके साथ प्रहार किया। परन्तु गर्जना करते हुए माल्यवान्के प्रहार करते-न-करते ही भगवान्‌ने चक्रसे उसके सिरको भी धड़से अलग कर दिया॥ ५७॥✎ 726 727 728 729

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे देवासुरसंग्रामे दशमोऽध्यायः॥ १०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #726 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #727 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #728 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #729 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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