॥ श्रीहरिः ॥
तस्य तत् पूजयन् कर्म यन्तुर्दानवसत्तमः।
शूलेन ज्वलता तं तु स्मयमानोऽहनन्मृधे॥ १७
tasya tat pūjayan karma yanturdānavasattamaḥ|
śūlena jvalatā taṃ tu smayamāno'hananmṛdhe|| 17
अर्थ
दानवश्रेष्ठ जम्भने रणभूमिमें मातलिके इस कामकी बड़ी प्रशंसा की और मुसकराकर चमकता हुआ त्रिशूल उसके ऊपर चलाया॥ १७॥
तस्य तत् पूजयन् कर्म यन्तुर्दानवसत्तमः।
शूलेन ज्वलता तं तु स्मयमानोऽहनन्मृधे॥ १७
दानवश्रेष्ठ जम्भने रणभूमिमें मातलिके इस कामकी बड़ी प्रशंसा की और मुसकराकर चमकता हुआ त्रिशूल उसके ऊपर चलाया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.11.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 959) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/11/17/