श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.31

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तदापतद् गगनतले महाजवं

विचिच्छिदे हरिरिषुभिः सहस्रधा।

तमाहनन्‍नृप कुलिशेन कन्धरे

रुषान्वितस्त्रिदशपतिः शिरो हरन्॥ ३१

tadāpatad gaganatale mahājavaṃ

vicicchide haririṣubhiḥ sahasradhā|

tamāhanannṛpa kuliśena kandhare

ruṣānvitastridaśapatiḥ śiro haran|| 31

अर्थ

परीक्षित् ! इन्द्रने देखा कि त्रिशूल बड़े वेगसे मेरी ओर आ रहा है। उन्होंने अपने बाणोंसे आकाशमें ही उसके हजारों टुकड़े कर दिये और इसके बाद देवराज इन्द्रने बड़े क्रोधसे उसका सिर काट लेनेके लिये उसकी गर्दनपर वज्र मारा॥ ३१॥

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