श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.47

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तत्राविनष्टावयवान् विद्यमानशिरोधरान्।

उशना जीवयामास संजीविन्या स्वविद्यया॥ ४७

tatrāvinaṣṭāvayavān vidyamānaśirodharān|

uśanā jīvayāmāsa saṃjīvinyā svavidyayā|| 47

अर्थ

वहाँ शुक्राचार्यने अपनी संजीवनी विद्यासे उन असुरोंको जीवित कर दिया, जिनके गरदन आदि अंग कटे नहीं थे, बच रहे थे॥ ४७॥

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