वास्तवमें वह सुन्दरी भगवान्की रची हुई माया ही थी, इससे उसने किसी प्रकार शंकरजीके भुजपाशसे अपनेको छुड़ा लिया और बड़े वेगसे भागी॥ ३०॥✎ 734735736737738
आत्मानं मोचयित्वाङ्ग सुरर्षभभुजान्तरात्।
प्राद्रवत्सा पृथुश्रोणी माया देवविनिर्मिता॥ ३०
वास्तवमें वह सुन्दरी भगवान्की रची हुई माया ही थी, इससे उसने किसी प्रकार शंकरजीके भुजपाशसे अपनेको छुड़ा लिया और बड़े वेगसे भागी॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 967) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/12/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)