श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.30

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

आत्मानं मोचयित्वाङ्ग सुरर्षभभुजान्तरात्।

प्राद्रवत्सा पृथुश्रोणी माया देवविनिर्मिता॥ ३०

ātmānaṃ mocayitvāṅga surarṣabhabhujāntarāt|

prādravatsā pṛthuśroṇī māyā devavinirmitā|| 30

अर्थ

वास्तवमें वह सुन्दरी भगवान्‌की रची हुई माया ही थी, इससे उसने किसी प्रकार शंकरजीके भुजपाशसे अपनेको छुड़ा लिया और बड़े वेगसे भागी॥ ३०॥✎ 734 735 736 737 738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #734 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #735 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #736 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #737 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #738 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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